सदी यो से हिन्दू धर्मं पे किये अतियाचार की वजह से और कुछ ज्ञान के आभाव में हम हिन्दू अपने धर्मं के सही मायने ही भूल गये हे। हमारे हिन्दू धर्म में किसी और धर्म के लिए सेकुलर रहने की बात न ही कही गई हे। क्योकि वैदिक काल में विश्व में हिन्दू एक ही धर्मं था।
जेसे की गीता में लिखा हे, अधर्म को सहेन करने वाला मानुस पशु सामान हे। वेसे ही धर्मं के विरुद्ध में कम करने वाले पापी राक्षस सामान हे। आज कल हिन्दू और उनके धर्मं को नीचा दिखा ने वाले अज्ञानी की कोई कमी नहीं हे। इस लिए धर्मं का ज्ञान लेकर ही उनको परास्त किया जा सकता हे। ज्ञान धर्मं और ज्यादातर विश्व्यापी भाषा की जननी संस्कृत का ज्ञान रखना भी आवश्यक हे।
अहङाकरं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
अंहकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध, बाह्य वस्तुओं और आन्तारिक चिन्तनों का त्यागकर, ममतारहित, शान्त अन्त: करण हुआ पुरुष परब्रह्म के साथ एकीभाव होने के लिये योग्य होता है।
21 सदी में पैसे का बोल बाला हे और हर कोई उसके पीछे भाग रहा हे। मे ये नहीं कहेना चाहता की पैसा जरुरी नहीं हे। पर जरुरत से ज्यादा पैसा जरुरी नहीं हे। जयादा पैसे की लालच इन्सान को अपनी आत्मा और धर्मं के विचारो के खिलाफ कामकरने पर मजबूर कर ती हे, जो बादमे एक आदतन क्रिया बन जाती हे। आम आदमी आज जो कुछ सहन कर रहा हे वो उसकी लालसा और धर्मं से विमुख ता दर्शा ता हे।
जेसे गीता में लिखा हे,
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
वेसे ही गीता में आत्मा के लिए
‘ज्ञानाधिकरणमात्मा । सः द्विविधः जीवात्मा परमात्मा चेति।'
आत्मा को ही बह्म रूप में स्वीकार करने की विचारधारा वैदिक एवं उपनिषद् युग में मिलती है। ‘प्रज्ञाने ब्रह्म', ‘अहं ब्रह्मास्मि', ‘तत्वमसि', ‘अयमात्मा ब्रह्म' जैसे सूत्र वाक्य इसके प्रमाण है। ब्रह्म प्रकृष्ट ज्ञान स्वरूप है। यही लक्षण आत्मा का है। ‘मैं ब्रह्म हूँ', ‘तू ब्रह्म ही है; ‘मेरी आत्मा ही ब्रह्म है' आदि वाक्यों में आत्मा एवं ब्रह्म पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं।
आत्मा एवं परमात्मा का भेद तात्विक नहीं है; भाषिक है।"
आत्मा और परमात्मा दोनो अलग-अलग है आत्मा रचना है और परमात्मा उसके रचीयता है इस आधार से दोनो मे पिता-पुत्र क नाता हो जाता है दोनो क स्वरूप भी एक जैसा ही है. आत्मा और परमत्मा दोनो के गुन भी समान ही है आत्म के गुन है घ्यान स्वरूप,प्रेम स्वरूप, पवित्रता स्वरूप,शान्त स्वरूप,सुख स्वरूप,आन्नद स्वरूप, एव शक्ति स्वरूप, परमत्मा के गुन है ग्यान के सागर, प्रेम के सागर, पवित्रता के सागर,शान्ति के सागर,सुख के सागर,आन्नद के सागर,एव सर्व शाक्तिमान है आत्मा जन्म-मरन मै आती है परमात्मा जन्म- मरन मे नहि आते , आत्मा पूरे कल्प मे ८४ जन्मो क पार्ट बजाना होता है कल्प चार युगो का होता है सतयुग.त्रेता,द्वापुर एव कलयुग
आत्मा ही इश्वर हे हमें ही अपने आत्मा रूपी इश्वर को जगाके अपनी और अपने धर्मं की रखा के लिये जागना होगा। येही हमारा जन्म जात कर्त्व्या हे।।
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